प्रेस विज्ञप्ति


  • वर्ष 2009 का प्रा. यशवंतराव केलकर युवा पुरस्कार डॉ. नंदिता पाठक को
  • प्रा. यशवंतराव केलकर युवा पुरस्कार के लिए देश भर से विविध क्षेत्र में जनकल्याण का कार्य करने वाले समाजिक कर्यकर्तायो से प्राप्त हुए नामांकनों में से चित्रकूट , मध्य प्रदेश के दीनदयाल शोध संस्थान की डॉ. नंदिता पाठक के नामांकन का ' रोजगार निर्माण एव ग्रामीण विकास ' हेतु कार्य के सन्मान में युवा पुरस्कार के चयनकर्ता मंडल ने चयन किया है !
    प्रा. यशवंतराव केलकर युवा पुरस्कार का प्रारंभ 1991 में इस श्रेष्ठ प्रेरणादाई व्यक्ति की पावन स्मृति में हुआ ! अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और विद्यार्थी निधि न्यासः का यह सयुक्त उपक्रम है ! विभिन् समाजोपयोगी विषयों पार कम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओ के कार्य को प्रोत्साहन देने हेतु समाज के समुख लाना और ऐसे कार्यकर्ताओ के प्रति समूचे युवा वर्ग की कृत्यागता प्रकट करना यह इस युवा पुरस्कार का प्रयोजन है ! इस युवा पुरस्कार में नगद राशिः रूपये 25,०००, प्रमाण पत्र एव स्मृति चिन्ह स्मविस्थ है !.....For more detail Click here

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  • प्रा. सबरवाल प्रकरण - असत्य के आधार पर एकतरफा प्रचार अन्यायकारक
  • उज्जैन के प्रा. सबरवाल की मृत्यु पर सभी को दुःख है , परन्तु उनकी मृत्यु पर उनके पुत्र, कांग्रेस एव अधिकतम मिडिया के लोगो की मिलीभगत से चल रही राजनीती सर्वाधिक दुखद है ! लोकतंत्र में टिपणी करने का एव न्याय के लिए लड़ने का अधिकार सभी को है , परन्तु इस मूलभुत बात का हनन हमारे समाचार माध्यमो द्वारा लगातार हो रहा है ! मिडिया का कोई वर्ग अनियंत्रित, झूठा, एकतरफा एव राजनीती से प्रेरित हो जाने पर उसे कैसे संतुलित या नियंत्रित किया जाये यह एक गंभीर चुनोती हमारे लोकतंत्र के सामने कड़ी है !
    जहा तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का सवाल है वह तो प्रकरण के पहले दिन से ही न्यायालयीन प्रक्रिया का सहयोग कर रही है ! झूठे आरोप में परिषद् के तत्कालीन प्रान्त अध्यक्ष को फसाया गया ! अगर सरकार निरपेक्ष न होती, तो यह संभव ही नहीं था की इतने प्रमुख व्यक्ति पर मुकदमा बनता ! आरोप के लगते ही परिषद् के सभी ६ कार्यकर्ता स्वयं पुलिस के सामने उपस्थित हुए !
    इस पुरे मामले में प्रा. सबरवाल के पुत्र श्री हिमांशु सबरवाल तथा उनके पुरे परिवार के द्वारा उठाई गयी आप्तियो को ध्यान में रखकर माननीय उचतम न्यायालय एव अन्य न्यायालयों द्वारा उन्हें कई प्रकार के विशेष अवसर प्रदान किये गए जिसे विद्यार्थी परिषद् ने हर मोके पर सहर्ष स्वीकार किया !
    इस प्रकरण को मध्य प्रदेश से हटाकर श्री हिमांशु की मांग पर महाराष्ट्र के नागपुर न्यायालय में स्थानांतरण किया गया !
    उचतम न्यायालय के आदेसनुसार माननीय नागपुर न्यायालय द्वारा मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सुझाये गए सरकारी वकील के स्थान पर श्री हिमांशु सबरवाल द्वारा सुझाये गए श्री प्रतुने सदिल्या को सरकारी वकील (विशेष लोक अभियोजक ) के तोर पर नियुक्त किया !
    माननीय नागपुर न्यायालय ने श्री हिमांशु सबरवाल के आग्रह पर लगभग २० नए गवाहों को प्रकरण में जोड़ा है ...
    माननीय न्यायालय द्वारा प्रस्तुत तथ्यो की नए सिरे से जाच की प्रक्रिया भी की गयी ! जिसके अंतरग ढेर सारे विडियो फुटेज की राष्ट्रीय प्रगोय्शाला में जाच की गयी !
    यह भी ध्यान रहे की पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दोरान सभी ६ आरोपी ३५ माह जेल में बांध रहे, एव जमानत के सामान्य अधिकार से भी वह वंचित रहे ! जिस नक्सली हिंसा में हजारो निर्दोस जनजाति लोग मरे जा रहे है ! ऐसे नक्सली विनायक सेन की जमानत के लिए तो मानवाधिकार , लोकतंत्र अदि की दुहाई हमारे अधिकतम समाचार माध्यम प्रतिदिन दे रहे थे ! लकिन दूसरी तरफ राजनीती से प्रेरित होकर एकतरफा न्याय की बात कर रह थे ! ऐसी कई घटनायों से इनका दोगलापन व राजनेतिक प्रेरणा तथा न्याय के प्रति भावनाए स्पस्ट होती है ! कई समाचार माध्यमो की सम्पादकीय टिपणी या चेनलो में कुछ बाते जिनके आधार पर साडी बाते कही जा रही है वह सरासर झूठ है ! जेसे :-
    समाचार माध्यमो में बनाया गया, की प्रा. सबरवाल के साथ परिषद् कर्यकर्तायो की गरम बहस को चेनलो में सभी ने देखा परन्तु सच यह है की बहस चुनाव प्रभारी प्रा. नाथ के साथ हुई थी ! (उसी के सम्बन्ध में उज्जैन में अलग से केस भी चल रहा है )
    महाविद्यालय में घुसते हुए जो भीड़ चेनलो ने दिखाई वह कांग्रेस प्रेरित अन्दोलानाकरियो की थी जो झंडो व हथियारों के साथ एन एस यु आय (NSUI) के समर्थन में महाविद्यालय में घुसे थे जिन्हें पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए बहार निकला था (जिसकी FIR भी हुई थी ) परन्तु चेनलो ने हमेशा इन दो झूठी बातो को प्रचारित किया की बहस प्रा. सबरवाल के साथ तथा भीड़ परिषद् की है ! जबकि दोनों के वीडियो फुटेज मिडिया के पास उपलब्ध है !
    यह बात भी बार-बार कही जाती है की प्रा. सबरवाल को मारते हुए सारे दुनिया ने देखा परन्तु तिन वर्षो से किसी ने भी ऐसी कोई वीडियो फुटेज सामने नहीं लाई, जबकि न्यायालय न इस हेतु समूची मिडिया को आमंत्रित किया एव पुलिस द्वारा उनके बयां भी लिए गए ! इसलिए सच यह है की दुनिया के सामने जोड़-तोड़ कर बातो को इस तरह प्रस्तुत करते हुए परिषद् को बदनाम करने हेतु इस पुरे प्रकरण में प्रचार को दबावतंत्र के रूप में उपयोग किया गया !
    अथार्त हमें न्याय की प्रक्रिया पर विश्वास था वह हमें प्राप्त भी हुआ है ! कुछ प्रश्न अनूतरतित रहेंगे की देश के लिए कार्यरत राष्ट्रवादियों को कब तक ऐसे झूठे प्रचारों का सामना करना पड़ेगा, उसके लिए वर्षो तक जेल में रहना पड़ेगा ...?
    सत्य प्रताडित हो सकता है परन्तु पराजित नहीं !