हमें चाहिए भारत के अनुरूप शिक्षा

Sri. Sunil Ambekar, National Org Secretary, ABVP.
 
आज पुरे  देश में नई शिक्षा नीति के बारे में चर्चा हो रही है। केंद्र सरकारें, राज्य सरकारें, विश्वविद्यालय, चाहे प्राद्यापक व छात्र-छात्राएँ एवं सामान्य जनों से भी शिक्षा में परिवर्तन की माँग उठ रही है।  शिक्षा को रोजगार तक ही सीमित कर देना, भारी भूल समझ  में आ रही है और इस दॄष्टि में बदलाव की सबसे अधिक आवश्यकता है।  निश्चित रूप से एक छात्र को कुशलताओं की जरुरत होती है, जिसके आधार पर वह अपने जीवन-यापन की व्यवस्था कर सके और समाज के दैनंदिन जीवन में कोई ना कोई रचनात्मक योगदान कर सके. लेकिन साथ ही अपने राष्ट्र का इतिहास, उसके महापुरुष, उसकी अपनी सही पहचान, उसकी समृद्धि, उसकी विविधताओं, परम्पराओं आदि के विषय में जानना भी एक बालक व युवक के लिए आवश्यक है।
 
शिक्षा केवल एक भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए, कुछ कुशलताओं का अर्जन करने का माध्यम नहीं है।  शिक्षा वह दृष्टिकोण  है जिसके माध्यम से पूरा समाज अपने जीवन के मूल्यों को निर्धारित  करता है और उसके आधार पर अपने समाज-जीवन की व्यवस्थाएँ गठित करता है। 
बहुत सारे विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, शासकीय तथा निजी क्षेत्र में, बहुत सारी व्यवस्थाओं का फैलाव हुआ है।  मुख्य मुद्दा यह है की यह शिक्षा सभी लोगो के लिए सुलभ, उपलब्द् हो सके, सामान्य लोगो की पहुँच के अंदर आ जाए चाहे वह स्कूल  सरकारी हो अथवा निजी हो, उसको अच्छे शिक्षक पर्याप्त  मात्रा में प्राप्त हो।  
 
 
प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक उसे एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में अध्ययन करने का अवसर मिले और अपने देश व समाज के बारे में भी समझने-सीखने का अवकाश रहे।  शिक्षा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष है - चरित्र निर्माण। किन्तु दुर्भाग्य से आज की हमारी शिक्षा देशभक्ति, नैतिकता, आत्मीयता के भाव-जागरण से सर्वथा दूर हो गई है। वास्तव  में, आनेवाले समय में शिक्षा में जो बदलाव लाना है उसमें दो महत्वपूर्ण बातें है - एक तो शिक्षा सबके लिए सुलभ करना, जिसके लिए शिक्षा के व्यापारीकरण को रोकने होगा और दूसरा शिक्षा में क्या पढ़ाया जाये, इस विषय में उपरोक्त बातों को ठीक तरीके से उसमें शामिल किया जाए, यह आज के समय की प्राथमिकता है, यदि प्याज की उपलब्धता सबके लिए नहीं हो पाती, तो उसकी दरें बढ़ जाती है और तो जनता सरकारें उखाड़ देती है।  
 
 
आज हमारे देश की युवा पीढ़ी को अच्छी शिक्षा मिले और यदि वह नहीं प्राप्त हो रही है, तो समाज को उसमें गंभीरता दिखाते हुए अपना आक्रोश व्यक्त करना पड़ेगा; राजनीतिक दलों, सरकारों पर दबाव बनाना पड़ेगा और शिक्षा क्षेत्र में बैठे विद्वानों,  विश्वविद्यालयों को भी एक नैतिक दबाव डालना पड़ेगा जिससे वे समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप बदलाव करे।  
 
हम जानते है की मार्क्स और मैकाले के मानस पुत्रों ने षड़यंत्र पूर्वक शिक्षा को तहस-नहस व विकृत किया है।  अब समय आ गया है की हम उन षड्यंत्र को धराशायी करते हुए अपने देश व संस्कृत के अनुरूप विषय-वास्तु से शिक्षा को समृद्ध करे।  इसके लिए सारे देशवासियो के द्वारा एक अभियान चलाया जाना अपेक्षित है।  जिसके माध्यम से अब तक के षड्यंत्रकारिओं द्वारा उठायी जा रही अनर्गल चर्चाओं को पूर्ण विराम लगाया जा सके, इस दिशा में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने पहल की है।     
 
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सुनील आंबेकर
राष्ट्रीय संगठन मंत्री, ABVP